रायगढ़। नागपंचमी भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं का महत्वपूर्ण पर्व है। सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाए जाने वाले इस पर्व का संबंध नागदेवता के प्रति श्रद्धा, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जीव-जंतुओं के संरक्षण की भावना से जुड़ा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में नागपंचमी पर अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं। कहीं गोबर से नाग की आकृति बनाकर पूजा की जाती है तो कहीं मिट्टी से बनी नाग प्रतिमाओं की पूजा होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में नाग-बांबी की पूजा कर लोग नागदेवता के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
लोकमान्यता है कि नागदेवता की पूजा करने से परिवार को सर्प भय से मुक्ति और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन कृषि कार्य, विशेषकर खेतों में हल चलाने और बुवाई से भी परहेज किया जाता है। इसके पीछे सर्पों सहित प्रकृति और जीव-जंतुओं के संरक्षण से जुड़ी लोकमान्यताएं मानी जाती हैं।
दूध पिलाने की परंपरा पर वैज्ञानिक नजरिया
नागपंचमी के साथ जुड़ी प्रमुख भ्रांतियों में सांपों को दूध पिलाने की परंपरा भी शामिल है। धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए यह समझना जरूरी है कि सांप प्राकृतिक रूप से दूध पीने वाले जीव नहीं हैं। वे मांसाहारी होते हैं और उनके शरीर में दूध को सामान्य आहार के रूप में पचाने की उपयुक्त व्यवस्था नहीं होती।
नागपंचमी के दौरान कई स्थानों पर सपेरे सांपों को लंबे समय तक पिटारों में बंद रखते हैं। भोजन और पानी से वंचित रखने के बाद उनके सामने दूध रखा जाता है। ऐसी स्थिति में सांप दूध को किसी विशेष पसंद के कारण नहीं, बल्कि अत्यधिक प्यास या निर्जलीकरण की स्थिति में तरल पदार्थ के रूप में ग्रहण कर सकता है। यह उसके स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, सांपों का दूध के प्रति विशेष आकर्षण होने की धारणा वैज्ञानिक आधार पर सही नहीं है। फिल्मों और लोककथाओं में सांपों से जुड़ी कई ऐसी बातें प्रचलित हैं, जो उनके वास्तविक व्यवहार से मेल नहीं खातीं। इसलिए श्रद्धा के नाम पर किसी जीव को कष्ट देना उचित नहीं है।
आस्तिक मुनि की कथा देती है संरक्षण का संदेश
नागपंचमी से जुड़ी प्रसिद्ध पौराणिक कथा राजा परीक्षित, उनके पुत्र जनमेजय और आस्तिक मुनि से संबंधित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई थी। इसके बाद राजा जनमेजय ने नागों के विनाश के उद्देश्य से सर्पसत्र यज्ञ कराया। यज्ञ में बड़ी संख्या में नागों की आहुति दी जाने लगी।
कथा के अनुसार नागों पर बढ़ते संकट को देखते हुए आस्तिक मुनि यज्ञ स्थल पर पहुंचे और अपनी विद्वता तथा वाणी से राजा जनमेजय को यज्ञ रोकने के लिए सहमत किया। इस प्रकार अनेक नागों को विनाश से बचाया गया। लोक परंपराओं में आस्तिक मुनि द्वारा नागों को शीतलता प्रदान करने की कथा भी प्रचलित है। समय के साथ इस कथा के विभिन्न लोक रूप सामने आए और नागों को शीतलता देने की भावना कई जगह दूध से स्नान कराने तथा बाद में दूध पिलाने की परंपरा से जुड़ गई।
इस कथा का मूल संदेश आज भी प्रासंगिक है—मनुष्य और सर्प के बीच संघर्ष के बजाय सह-अस्तित्व और संरक्षण की भावना विकसित करना।
पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं सांप
सांप प्रकृति के महत्वपूर्ण जीव हैं और पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी अहम भूमिका है। वे चूहों और कई अन्य जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसका सीधा लाभ कृषि व्यवस्था को भी मिलता है। ऐसे में सर्पों का संरक्षण पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।
नागपंचमी को केवल पूजा-पाठ तक सीमित रखने के बजाय इसे सर्प संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता का अवसर बनाया जा सकता है। इस दिन वास्तविक सांपों को पकड़कर प्रदर्शन करने, उन्हें पिटारों में बंद रखने, दूध पिलाने अथवा उनके साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ से बचना चाहिए।
श्रद्धा के साथ करुणा ही सच्ची पूजा
नागपंचमी पर नागदेवता की पूजा के साथ यदि सर्प संरक्षण का संकल्प लिया जाए तो पर्व की सार्थकता और बढ़ सकती है। आस्था का सम्मान करते हुए जीवों के प्रति करुणा रखना ही सच्ची श्रद्धा है।













